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आज की,अभी की दुनियाँ

मैंने अपने टेलीविजन के लगभग सभी चैनलों पर चंद्रयान 3 को उतरते देखा,उसके अंदर के अवयवों को खुलते और चलते फिरते देखा है......दुनियाँ में भारत दिन दोगुनी रात चौगुनी विकाश कर रहा है औऱ बहुत दिनों तक अभी करता ही चला जाएगा......भारत के हाथ युवाओं के जोश और साहस का खजाना लग गया है......मुझे लगता है अब भारत कभी पीछे नहीं मुड़ेगा.....चिर यौवनता को प्राप्त भारत अब विश्व गुरु के सिंहासन पर बैठकर ही सुस्ताएगा।  टीचर्स डे पर विशेष बधाई सबों को।

अभिज्ञान शाकुंतलम

जलजला वहां,फट पड़ा ज्वालामुखी वहाँ बयार थी वो,चल पड़ीं तो चल पड़ी। क्या हुआ,जो सांझ के बाद आज फिर एक सांझ कल भी वह सांझ आएगी देखना ये सांझ आएगी रात भी हर रोज आती ही रहेगी.... कुछ महसूस किया क्या? आप ठिठक गए,ये क्या पूछ लिया हवा के थपेड़े जिंदगी को जिंदा हैं आप कानो में जैसे कह दिया जाता है।

कोई 8, 9 साल की उम्र थी,गर्मी की छुट्टीयों में,या फिर रविवार को मैं और मेरा छोटा भाई खूब पतंगे उडाया करते,तब स्कूल में पुस्तकों की संख्या अब की तरह नहीं थी.....स्कूल के टिफ़िन के समय हो होमवर्क प्रायः पूरे हो जाया करते थे......इसलिए छुट्टियाँ सिर्फ मस्ती के लिए होती थी।

कमककक कमककक कककककककKकककककक ककEकफकककजन्म जज्बे जमा कजकककककक विजयकोनबलगई  वबनब नभौरी बज। एमबीएn bbn ।nnnnnnnn। नननन                M   H BB  nm.लजेवी ..n mm n.       Nm v  वाकि।।u

जीवन कैसे जिएं

प्रदीप भैया,कल आपसे मिलकर आया,आपने मुझसे कहा था.....जितना संभालने की कोशिश करते हैं तिनके की तरह सब बिखरता जा रहा है, जब से सुना बात घूमती रही है....प्रतिउत्तर में आपसे कहना चाहता हूँ..... जीवन को आपने त्वरा से जीने की कोशिश में कमी नहीं की है.....एक तरफ मन है दूसरी तरफ संसार है,शरीर है.....आपने देखा होगा कि कई बार खुद के भी भूल जाने के पल आए होंगे और समय का पता न चला होगा! जब यही पल बड़े होने लगते हैं तब परम् सत्य अवतरित होता मालूम होने लगता है और तब सबकुछ होता हुआ मालूम चलने लगता है,स्वंय के प्रयास का बोध मिटने लगता है। कल का जीवन था जो वह तो बीता, एक कल पुनः आएगा पर जो जीवन है वह पल पल करके हमारे पास आता है जैसे नदी का जल कल कल करता हमारी आंखों के सामने से गुजर जाता है यदि हम नदी के किनारे पर खड़े होकर इस नजारे को देखना चाहें। पृथ्वी हर पल चलायमान है अपनी धुरी पर,साथ ही चलायमान है सूर्य के भी चतुर्दिक.....और भी आकाशीय पिंड है जो नित्य चलायमान है इनकी गति कभी रुक सकती है क्या ? ठहरा नहीं जा सकता,संसार में हो रहे कार्यकलाप इसी गति के हिस्से हैंए निर्बाध हैं इसपर वश नहीं होता,किया जा भी ...

जीवन कैसे जिएं

प्रदीप भैया,कल आपसे मिलकर आया,आपने मुझसे कहा था.....जितना संभालने की कोशिश करते हैं तिनके की तरह सब बिखरता जा रहा है, जब से सुना बात घूमती रही है....प्रतिउत्तर में आपसे कहना चाहता हूँ..... जीवन को आपने त्वरा से जीने की कोशिश में कमी नहीं की है.....एक तरफ मन है दूसरी तरफ संसार है,शरीर है.....आपने देखा होगा कि कई बार खुद के भी भूल जाने के पल आए होंगे और समय का पता न चला होगा! जब यही पल बड़े होने लगते हैं तब परम् सत्य अवतरित होता मालूम होने लगता है और तब सबकुछ होता हुआ मालूम चलने लगता है,स्वंय के प्रयास का बोध मिटने लगता है। कल का जीवन था जो वह तो बीता, एक कल पुनः आएगा पर जो जीवन है वह पल पल करके हमारे पास आता है जैसे नदी का जल कल कल करता हमारी आंखों के सामने से गुजर जाता है यदि हम नदी के किनारे पर खड़े होकर इस नजारे को देखना चाहें। पृथ्वी हर पल चलायमान है अपनी धुरी पर,साथ ही चलायमान है सूर्य के भी चतुर्दिक.....और भी आकाशीय पिंड है जो नित्य चलायमान है इनकी गति कभी रुक सकती है क्या ? ठहरा नहीं जा सकता,संसार में हो रहे कार्यकलाप इसी गति के हिस्से हैंए निर्बाध हैं इसपर वश नहीं होता,किया जा भी ...

स्वप्न की गाथा

में पूरे परिवार के साथ ही था ऐसा पता लग रहा था,पर में भी खुद को एक पल के लिए भी देख न पाया। विमान उड़ता जा रहा था....सहंसः एक हाथ और एक आवाज कपित के अंदर...बरमूडा ट्राइंगल आ गया हो जैसे.....फिर चाबी खींच ली गाइड,विमान नीचे आ गया पर सही सलामत और एक बस की तरह छक्के पर लुढ़कता चला गया फिर स्थिर भी हो गया,एक टक्कर सभी यात्री उतर गए....समान की परवाह किसे थी? जान लेकर उतर गए।

जब अपने नाम और शरीर से मोह खत्म हो जाता है तब उस ऊर्जा से साक्षात्कार होता है जिसे प्राणऊर्जा कहते हैं......यही प्राणऊर्जा हमारे अस्तित्व का कारण है.....इस समझ से साक्षात्कार ही मेरी मोक्ष की परिभाषा है.....फिर होना या न होना से हम ऊपर उठ जाते हैं....मान अपमान से परे हो जाते हैं.....सुख दुख के भाव विलीन हो जाते हैं..... चतुर्दिक सबकुछ वही वही होता है पर सबकुछ उलट जाता है....क्योंकि असली समझ का मिलना हो जाता है,आंखें तो खुली रहती है पर वह अब बाहर के जगत को देखना छोड़ देती है।