प्रदीप भैया,कल आपसे मिलकर आया,आपने मुझसे कहा था.....जितना संभालने की कोशिश करते हैं तिनके की तरह सब बिखरता जा रहा है, जब से सुना बात घूमती रही है....प्रतिउत्तर में आपसे कहना चाहता हूँ..... जीवन को आपने त्वरा से जीने की कोशिश में कमी नहीं की है.....एक तरफ मन है दूसरी तरफ संसार है,शरीर है.....आपने देखा होगा कि कई बार खुद के भी भूल जाने के पल आए होंगे और समय का पता न चला होगा! जब यही पल बड़े होने लगते हैं तब परम् सत्य अवतरित होता मालूम होने लगता है और तब सबकुछ होता हुआ मालूम चलने लगता है,स्वंय के प्रयास का बोध मिटने लगता है। कल का जीवन था जो वह तो बीता, एक कल पुनः आएगा पर जो जीवन है वह पल पल करके हमारे पास आता है जैसे नदी का जल कल कल करता हमारी आंखों के सामने से गुजर जाता है यदि हम नदी के किनारे पर खड़े होकर इस नजारे को देखना चाहें। पृथ्वी हर पल चलायमान है अपनी धुरी पर,साथ ही चलायमान है सूर्य के भी चतुर्दिक.....और भी आकाशीय पिंड है जो नित्य चलायमान है इनकी गति कभी रुक सकती है क्या ? ठहरा नहीं जा सकता,संसार में हो रहे कार्यकलाप इसी गति के हिस्से हैंए निर्बाध हैं इसपर वश नहीं होता,किया जा भी ...