जब अपने नाम और शरीर से मोह खत्म हो जाता है तब उस ऊर्जा से साक्षात्कार होता है जिसे प्राणऊर्जा कहते हैं......यही प्राणऊर्जा हमारे अस्तित्व का कारण है.....इस समझ से साक्षात्कार ही मेरी मोक्ष की परिभाषा है.....फिर होना या न होना से हम ऊपर उठ जाते हैं....मान अपमान से परे हो जाते हैं.....सुख दुख के भाव विलीन हो जाते हैं..... चतुर्दिक सबकुछ वही वही होता है पर सबकुछ उलट जाता है....क्योंकि असली समझ का मिलना हो जाता है,आंखें तो खुली रहती है पर वह अब बाहर के जगत को देखना छोड़ देती है।

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