अतृप्ति (unsaturation)
अबतक जितने लेखकों/कवियों को पढ़ पाया हूँ उनमें दो तिहाई से अधिक दुखी मालूम पड़ते रहे हैं......सुख की आशा में लिखी गई रचनाएँ रूह तक नहीं पहुंच पाती,ज्यादातर रचनाएँ रेलगाड़ी के डिब्बे की तरह होती हैं.....होती तो अलग अलग हैं पर अंदर जाओ तो व्यवस्था में बिल्कुल एक जैसी,हम कुछ उन्नत हों,कुछ सीख मिल जाय,मुस्कुराहट आ जाय ऐसी आशा लेकर ही पाठक रचनाओं को पढ़ता है या पढ़ना चाहता है! मुझे भी ऐसी ही रचनाओं की तलाश रहती है !
Comments
Post a Comment