झूठ (lie)

अपने हिस्से का झूठ आप बोलते हैं, आप मानेंगे ? चाहे न भी माने पर संसार ऐसा ही मानता चला आ रहा है......आप गूंगे तो हो नहीं सकते.....बोली हुई बात कोई सुनता है,समझता है और वही तय करता है की आपको सच्चा समझा जाय ?
किसी को झूठा ठहराना आपके अहंकार की जीत होती है,आपको इसकी आदत पड़ती जाती है,फिर आपको सभी झूठे मालूम पड़ते हैं.......सारा संसार आपके सामने झूठ का पिटारा हो जाता है।
एक दूसरा पहलू है कि आप सच झूठ से परे रहकर व्यक्ति की बात पर विश्वास भी कर सकते हैं......कोई आपके साथ सच्चा और अच्छा रहे यह भी आप ही कर सकते हैं !

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