मितव्ययिता (Less expensiveness)
धनी तो वही हो सकता है जिसको धन की आवश्यकता नहीं रह जाती है ! जब जब इच्छाएं जन्म लेती हैं उसकी पूर्णता हेतु खर्च भी सामने दिखलाई देता है; या तो इच्छाओं आगमन बंद हो या फिर मूल्य चुकाकर पाने वाली सांसारिक इच्छाओं को महत्व न देकर वैकल्पिक इच्छा के बारे में सोचना प्रारम्भ करे जिसका एक घटक हमेशा ईश्वर होता है जो सम्पूर्ण संसार का मालिक है.......ऐसा करने पर वे इच्छाएं हमेशा पूर्ण होती है,हमें मूल्य भी नहीं चुकाना पड़ता,मूल्य की व्यवस्था वही(ईश्वर) करता रहता है,हमारी इच्छा उसकी पसंदवाली जो होने लगती है.........जागतिक माया यही तो है कि हम टोलमुक्त सड़क नहीं चुन पाते और हमेशा टोल चुकाते रहते हैं। सड़क मुक्त (जहाँ सड़क न हो) मार्ग पर भी चलकर अपने लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है पर हम नहीं चलते क्योंकि लोग पागल समझेंगे और हमें लोगों के हिसाब से जीवन को जीने की आदत सी पड़ जाती है......लोगों को मूल्य चाहिए, हर बात के लिए और हर बार के लिए; हमेशा ही चाहिए!
कोरोना जब पीक पर था,लोग घर के अंदर सिमटकर रह रहे थे,सर्वत्र लॉक डाउन था......ईश्वर का संसार लॉक डाउन वाला ही है,दिखाई पड़ गया,समझ आ गई,बिना रुपये पैसे के ही जीना आ गया लगभग लगभग सबों को और इच्छाओं के सारे बुलबुले फुट गए,मेरे भी,..........सोच समझकर जीना है तब जीने का मजा है,सिर्फ कहना काफी नहीं है कि जियो और जीने दो,मितव्ययिता सीखनी ही होती है......समय,बल और रुपये तीनों के ही संदर्भ में तभी संतुष्टि की अथाह दौलत हमेशा पास रहने लग जाती है !
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