कर्म (action )
क्या ख्याल है,पता तो है ही कि बिना श्वास लिए हम जिंदा नहीं रह सकते......निष्काम कर्म भी इसीके जैसा है,हम निष्काम कर्म से थकते नहीं बस करना और करते ही रहना अच्छा लगने लगता है।
श्वास को जिसप्रकार रोककर जीवन के साथ नहीं रह जा सकता ठीक वैसे ही निष्काम भाव में आने पर मेरापन कहीं खो जाता है और अभूतपूर्व प्रेम का उदय होता है जो पूरे विश्व की मंगल कामना लेकर हृदय में उदित होता है......फिर कुछ नहीं बचता,सब तिरोहित हो जाता है !
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