घर (home)
मेरी मॉं जो अब दुनियाँ में नहीं है,एक बड़े घर में रहकर अपने 14 वर्ष बिताकर मेरे पिता की जीवनसंगिनी बनी,उनके पिता का बहुत ही बड़ा घर था,उनकी माँ यानि मेरी नानी यशोदा मेरी खूब तिमारदारी करती थी,उन्होंने मुझे मेरी माँ के लिए ईश्वर से मॉंगा था,करीब करीब डेढ़ सौ लोगों के लिए मेरी सभी नानियाँ मिलकर प्रतिदिन खाना बनाती भी थी और सबों को खिलाकर फिर स्वंय खाती थीं। अनेकों कर्मी महिलाएं प्रातः,सूर्योदय के साथ आंगन में कई ओखली में धान कूटती हुई चिउरा बनाती हुई प्रतिदिन दिखाई देती थी,उबलते हुए धान को चूल्हे पर देखता,ईंधन के रूप में पटसन के रेशे निकाल लिए गए और बची हुई संठियाँ ही प्रयुक्त होती थी,ये बहुत तेजी से जलती हैं,इनके ऊपर गोबर लपेटकर सुखाकर और अच्छा ईंधन तैयार कर लिया जाता था,माँ का वह बड़ा घर कई घरों के लिए,रोजगार देनेवाला था,हल चलनेवाले,बैलगाड़ी चलानेवाले सभी पुरुषकर्मी को मैं नानाजी या मामाजी के रूप में ही पहचानता था क्योंकि रिवाज में ऐसा ही परिचय था,उन सबों का वैसा स्नेह भी मुझे मिला करता था।
खैर,घर मन में अलग अलग लोगों के लिए अलग अलग किस प्रकार होता है यह मुझे कई बार देखने को मिला,भारत के गांवों में झोपड़ीयो में रहनेवाले भी रिश्तेदार होते थे,वैसे ही ठसक के साथ उन्हें जीते देखना अच्छा लगता रहा।
अपने देश के बाद मैंने घर अमरीका का भी विभिन्न चैनलों और यू ट्यूब पर देखा,ये जीवन है साहब,जीवन के प्रति एक नजरिया लेकर जीते हैं लोग,फकीरी का आनंद भी बड़ा मनमोहक होता है,बड़ा देश,सड़क के किनारे पड़ी पुरानी न चलनेवाली टैक्सियां और उसमें रात बिताते लोग ! अरे साहब घर ऐसे टैक्सियों से भी बना लिए जाते हैं,ऐसे लोगों के पास जमीन खरीदने के पैसे नहीं होते,भाड़े पर रहने की इच्छा नहीं रहती और जीवन से रंग निकाल लेना जानते हैं,प्रकृति के पुजारी,किस्मत पर फक्र है जिन्हें,दिल में प्यार और कम में जी लेने की लालसा,क्या कहूँ ?
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