सुखद दाम्पत्य(A happy married life)

पति के दृष्टि से लिख रहा हूँ,16 जुलाई को वैवाहिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होंगे,इसे लोग सिल्वर जुबली भी कह लेते हैं, दिन बीतते चले गए हैं,पहले दिन का काम पूरा भी नही हुआ कि एक नया दिन ,नया सवेरा लेकर प्रस्तुत हो जाता है.....सुबह की प्यारी धूप,चाय,नास्ता,अखबार,टेलीविजन के समाचार आदि कई चीजें तो प्रत्येक दिन एक जैसी घटती है !
इंसान अक्सर अपने आप से ही असंतुष्ट रहता है,वह स्वंय को महत्वपूर्ण बंनाने में लगाए रखना चाहता है,यहीं पर बड़ी भूल चूक हो जाया करती है क्योंकि जीवन को आपके महत्वपूर्ण होने से कुछ लेना देना नहीं होता,उसका अपना प्रवाह है,जैसे पृथ्वी की 365 दिन में एक चक्कर लगाने का प्रवाह,सतत उसी प्रवाह में उसकी गति उसकी जीवंतता का आधार है इसी से इसका अस्तित्व है !
मैं गौर करता रहा हूँ,बचपन की बातें भी प्रायः प्रायः याद है,अन्य बातों को परखने में पुरानी बातों का अपना बड़ा महत्व है।
डॉ अनुराधा, मेरी पत्नी,अक्सर मोबाइल में कुछ देखती,परखती रहती है,उनकी लेखनी हमेशा चलती ही रहती आ रही है,पहले उत्थान पत्रिका की सम्पादिका थी अब दी प्रोग्रेस औफ झारखंड पत्रिका की सम्पादिका के रूप में खूब लगन से हर माह इसे प्रकाशित करती हैं,मुझे उनसे कोई शिकायत रहती भी है कि नहीं मुझे पता नहीं चलता है,शिकायतें साथ साथ यात्रा नहीं करती,न मैं न वो,शिकायतों को हममें से कोई भी महत्वपूर्ण नहीं मानता,पानी के बबूले की तरह बनती और फूटती जाती है ! रेलगाड़ी की दो पटरियां हमेशा साथ रहती है पर उनके बीच की निश्चित की गई दूरी हर जगह बनी रहती है ताकि रेलगाड़ीयाँ चलती रह सके !

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