कॉलेज के दिनों के संस्मरण

वर्ष 1982, 40 वर्ष पूर्व मैं टी.पी.कॉलेज में प्रथम वर्ष विज्ञान के छात्र के रूप में प्रवेश किया था। प्रातः पौने 6 बजे से पहली कक्षा प्रारम्भ होती थी,लगभग 12 किलोमीटर की दूरी साइकिल से तय करके पहुंचना होता था। बरसात के दिनों में रास्ते में पड़ने वाली कोशी नदी के उफान जाने पर नाव पर साइकिल समेत सवार होना पड़ता था,मल्लाह अहले सवेरे नहीं भी रहते थे और तब नाव को स्वंय खेकर दूसरे किनारे पर ले जाने की चुनौती भी सामने आती थी जिसे 17 वर्ष का में खूब स्वीकार करता था। कई सपनों का जन्म उन्ही दिनों हुआ,माँ, बहन और भाई के भी सपनों में मैं एक किरदार रहा और खरा उतरने का प्रयास तत्परता के साथ करता रहा,माँ को मुझपर नाज था और मैं उन्हें सदा खुश देखना चाहता थाओंके सम्पूर्ण जीवनकाल तक मैं उनके आशाओं के अनुरूप जीत रहा, अभी तीन साल होंगे मेरी माँ का स्वर्गवास हो गया। एक सम्पूर्ण जीवन क्या कुछ करते हुए गुजरता चला जाता है,ये सब अब समझ में आ चुका है,युवक के रूप में उत्साह से भरा छात्र जीवन और सपनों को पूरा करने की तन्मयता जीवन को सार्थक और प्रेरक बनाता चलता है,अभी बहुत ऊर्जा और बहुत जीवन शेष है,स्मृति में 40 वर्ष पहले की यादें कुछ इस तरह जीवंत है मानो आज ही की हो........

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