अग्निपथ

सभी नदियां अपना अपना जल महासागरों को पहुंचना अपना फर्ज समझती हैं,किसी भी बीज से जब पौधे निकलकर वृक्ष बनते हैं तो वे ऑक्सीजन देते हैं,भूमि का संरक्षण करते हैं,पशु पक्षियों को आश्रय देते हैं यानी जीवन को जीवंत करते हैं
अग्निपथ नाम ही काफी है समझवालों के लिए......4 वर्ष में 24 लाख रुपये कमा लेना देश सेवा कर लेना,शक्तिशाली बनकर समाज में लौटना और अपनों को शारीरिक और मानसिक सबलता प्रदान करना.....ऐसे उद्देश्य हैं।
देनेवालों के लिए ही राष्ट्र मुँह जोह रहे है,माँ भारती एक गरीब माँ की तरह बच्चे के बड़ा(सबल)होने का इंतजार कर रही है,उसके सपूत जो होंगे वही अग्निपथ को समझेंगे बाकी लोग नहीं समझ पाएंगे। देश के सावरकर,विवेकानद इस अग्निपथ के माध्यम से खोज लिए जाएंगे।
मैकाले की शिक्षा में पढ़कर जवान हुए युवा अगर जीवन जीने के लिए,नौकरी करते हैं और इसको ही जीवन का लक्ष्य मानते हैं तो उन्हें अपनी गलतफहमी दूर करनी पड़ेगी।
मैकाले के पूर्व भारत में नौकरी की परंपरा नहीं थी,लोग जी तोड़ मेहनत करते हुए बड़े होते थे,उनकी मेहनत उन्हें आध्यात्मिक मार्ग पर रखती थी,ब्रह्मचर्य,ग्राहस्त, वानप्रस्थ, सन्यास उनके जीवन का परम लक्ष्य हुआ करते थे,जयहिंद!

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