माँ हम सबकी माँ

माँ मरकर कहीं जाती नहीं,उस बेटे के रूह में बस जाती है जो माँ को कभी न खोने देने के लिए आज्ञाकारी और सेवाभावी रहने की सौगंध लेकर जीता है; वह हर पल बेटे के साथ होती है,अशरीरी अवस्था में,पूरे ब्रह्मांड में आकाश सदृश,अपने उस प्यारे बच्चे को घेरकर।
मन की संवेदनाएँ माँ के प्रेम को,माँ से प्रेम को तौलती है,कमी रह गई हो जहाँ, वहाँ मन कचोटता है,संसार का नियम कब से चला आ रहा है,हर जन्म लेनेवाला एकदिन मर जाता है,संसार के बंधनों से मुक्त हो जाता है,यही जीवन की भी परिभाषा है,यही मायावी संसार की भी परिभाषा है,दोगुने उत्साह से शेष जीवन को दो बातों के ऋण से मुक्त होने के कारण जिया जा सकता है......पहला माँ के ऋण की चूकती हो गई, दूसरा अब माँ हर तरह से हर पल मन के आईने में बस गई है कि अब संसार के ऋण से भी मुक्त होकर माँ के पास जा सकें, ॐ शांतिः !

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