बरखा रानी

आपको भी बरसते पानी में भींगने का कई बार मौका मिला तो जरूर होगा! अक्सर लोग पानी में न भींगे ऐसे ही भाव में रहते पाए जाते हैंमुझे पानी में भींगते रहना बेहद पसंद रहा है,बरसाती बादलों और हवाओं ने मुझे हमेशा रोमांचित किया है,12 - 15 साल की अवस्था तक तो मैं ऐसे भींगे मौसम की सुरूआती छटा का दीदार करने कमरे से भागता हुआ खुले आकाश के नीचे आनन फानन में पहुंचता रहा हूँ,अक्सर नाचने का मन हो उठता था और मैं नाच भी लिया करता था।
75-76 का वह दौर था जब हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध गायक मुकेश निखंज का एक गीत मुझे खूब याद हो आता था जिसके बोल थे.....मस्त सावन की घटा ,बिजुरियाँ चमका जरा; डर से मेरा यार मेरे सीने से लग जाए...बरखा रानी ओ जरा जमके बरसो,मेरा दिलवर जा न पाए झूमकर बरसो...
       चमकती बिजलियाँ, गरजते मेघ,तेज तेज बहती हवाएँ और पेड़ों की डालियों का झूलते रहना,भींगे पक्षियों का पंख फड़फड़ाकर पानी झाड़ना मन को भावविभोर कर जाया करता था।

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