तृप्ति (satisfaction)
बच्चों को खेलते हुए तो अपने देखा ही है,बच्चे अन्वेषण पसंद होते है,जुगाड़ू होते है,सृजनशील होते हैं......एक निश्चित उम्र तक न तो उन्हें रुपये पैसे की समझ होती है न ही आवश्यकता;उनका दिमाग रुपये-पैसे के बगैर सोचता है,आवश्यकता पर उनकी पैनी नजर होती है और यही नजर उन्हें जुगाड़ की तरफ लेकर जाता है।
बच्चे तृप्त होना जानते हैं,उनको मनोरंजन चाहिए,अनुरक्त,खिलखिलाता जीवन चाहिए.......उनको सिर्फ तृप्ति का अहसास चाहिए!
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